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mahabharat 6.32.28: जो व्यक्ति भक्ति मार्ग को स्वीकार करता है, वह वेदों के अध्ययन, तप, दान, दर्शन और निष्काम कर्मों के फल से वंचित नहीं रहता। वह केवल भक्ति करने मात्र से ही इन सभी फलों को प्राप्त कर लेता है और अन्त में परम सनातन धाम को प्राप्त करता है।   |   mahabharat अध्याय 6.32: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 8: भगवत्प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 32: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 8: भगवत्प्राप्ति  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  6.32.28 
वेदेषु यज्ञेषु तप:सु चैव
दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा
योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति भक्ति मार्ग को स्वीकार करता है, वह वेदों के अध्ययन, तप, दान, दर्शन और निष्काम कर्मों के फल से वंचित नहीं रहता। वह केवल भक्ति करने मात्र से ही इन सभी फलों को प्राप्त कर लेता है और अन्त में परम सनातन धाम को प्राप्त करता है।
 
The person who accepts the path of devotion is not deprived of the fruits of studying Vedas, penance, charity, philosophical and selfish deeds. He obtains all these fruits by merely performing devotion and finally attains the supreme eternal abode.
 
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्‍गीतापर्वणि श्रीमद्भगवद्‍गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अक्षरब्रह्मयोगो नामाष्टमोऽध्याय:॥ ८॥ भीष्मपर्वणि तु द्वात्रिंशोऽध्याय:॥ ३२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्‍गीतापर्वके अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवद्‍गीतोपनिषद्, श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें अक्षरब्रह्मयोग नामक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८॥ भीष्मपर्वमें बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)