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श्लोक 6.31.22  |
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च तत: कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥ २२ ॥ |
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| अनुवाद |
| वह इतनी श्रद्धा से किसी विशेष देवता की पूजा करके अपनी मनोकामना पूरी करने का प्रयास करता है। किन्तु वास्तविकता यह है कि ये सभी लाभ मुझे ही मिलते हैं। |
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| With such devotion he tries to worship a particular deity and fulfill his desire. But the reality is that all these benefits are given by me only. |
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