श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 30: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 6: ध्यानयोग  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  6.30.41 
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वती: समा: ।
श‍ुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ ४१ ॥
 
 
अनुवाद
असफल योगी, पवित्र आत्माओं के लोकों में अनेक वर्षों तक सुख भोगने के पश्चात् या तो पुण्यवान पुरुषों के परिवार में या धनवान लोगों के परिवार में जन्म लेता है।
 
The unsuccessful yogi, after enjoying many years in the realms of holy souls, is born either in a family of virtuous men or in a family of wealthy people.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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