श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 30: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 6: ध्यानयोग  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  6.30.37 
अर्जुन उवाच
अयति: श्रद्धयोपेतो योगाच्च‍‍लितमानस: ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ ३७ ॥
 
 
अनुवाद
अर्जुन बोले: हे कृष्ण! उस असफल योगी की क्या गति है जो पहले भक्तिपूर्वक आत्मसाक्षात्कार का मार्ग अपनाता है, किन्तु बाद में भौतिकता के कारण उससे विचलित हो जाता है और योगसिद्धि प्राप्त करने में असमर्थ हो जाता है?
 
Arjuna said: O Krishna! What is the fate of a failed Yogi who initially takes up the path of Self-realization with devotion but later gets distracted from it due to materialism and is unable to achieve Yoga Siddhi?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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