श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 30: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 6: ध्यानयोग  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  6.30.35 
श्रीभगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्रीकृष्ण बोले - हे महाबाहु कुन्तीपुत्र! निःसंदेह चंचल मन को वश में करना अत्यन्त कठिन है, किन्तु उचित अभ्यास और वैराग्य से यह सम्भव है।
 
Lord Shri Krishna said – O mighty-armed son of Kunti! Undoubtedly, it is very difficult to control the restless mind, but it is possible through proper practice and detachment.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)