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श्री महाभारत
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पर्व 6: भीष्म पर्व
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अध्याय 30: श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6: ध्यानयोग
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श्लोक 32
श्लोक
6.30.32
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दु:खं स योगी परमो मत: ॥ ३२ ॥
अनुवाद
हे अर्जुन! वह पूर्ण योगी है जो अपनी तुलना करके सभी प्राणियों के सुख-दुःख में सच्ची समानता देखता है।
O Arjuna, he is a perfect Yogi who, by comparison with himself, sees the true equality of all beings in their joys and sorrows.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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