| श्री महाभारत » पर्व 6: भीष्म पर्व » अध्याय 30: श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6: ध्यानयोग » श्लोक 31 |
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| | | | श्लोक 6.30.31  | सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थित: ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥ ३१ ॥ | | | | | | अनुवाद | | जो योगी मुझ परमात्मा को एक ही जानकर भक्तिपूर्वक परमात्मा की सेवा करता है, वह सब प्रकार से मुझमें ही स्थित रहता है। | | | | The Yogi who, knowing that I and the Supreme Soul are one and the same, serves the Supreme Soul with devotion, remains always situated in Me in every way. | | ✨ ai-generated | | |
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