श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 30: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 6: ध्यानयोग  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  6.30.2 
यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
हे पाण्डुपुत्र! जिसे संन्यास कहते हैं, उसे योग कहते हैं, अर्थात् परब्रह्म से मिलन, क्योंकि इन्द्रिय-तृप्ति की इच्छा का त्याग किए बिना कोई कभी योगी नहीं बन सकता।
 
O son of Pandu! What is called Sannyasa is known as Yoga i.e. union with the Supreme Brahman because without giving up the desire for sense gratification one can never become a Yogi.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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