श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 30: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 6: ध्यानयोग  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  6.30.13-14 
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिर: ।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ १३ ॥
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थित: ।
मन: संयम्य मच्च‍ित्तो युक्त आसीत मत्पर: ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
योगाभ्यास करने वाले को चाहिए कि वह अपने शरीर, गर्दन और सिर को सीधा रखे और अपनी दृष्टि को अपनी नासिका के अग्रभाग पर केन्द्रित करे। इस प्रकार अविचलित और दमित मन से, भयरहित होकर, सांसारिक जीवन से पूर्णतः मुक्त होकर, अपने हृदय में मेरा ध्यान करे और मुझे ही अपना परम लक्ष्य बनाए।
 
The person practising yoga should keep his body, neck and head straight and focus his gaze on the tip of his nose. In this way, with an unperturbed and suppressed mind, without fear, completely free from worldly life, he should meditate on me in his heart and make me his ultimate goal.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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