श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 30: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 6: ध्यानयोग  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  6.30.10 
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थित: ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रह: ॥ १० ॥
 
 
अनुवाद
योगी को चाहिए कि वह अपना तन, मन और आत्मा सदैव ईश्वर को समर्पित रखे, एकान्त स्थान में रहे और अपने मन को बहुत सावधानी से वश में रखे। उसे सभी प्रकार की महत्वाकांक्षाओं और संग्रह की इच्छाओं से मुक्त रहना चाहिए।
 
A yogi should always devote his body, mind and soul to God, stay in a solitary place and control his mind very carefully. He should be free from all ambitions and desires of accumulation.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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