श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 3: व्यासजीके द्वारा अमंगलसूचक उत्पातों तथा विजयसूचक लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  6.3.84 
न वैनतेयो गरुड: प्रशंसति महाजनम्।
दृष्ट्वा सुपर्णोऽपचितिं महत्या अपि भारत॥ ८४॥
 
 
अनुवाद
भरत! विनता के पुत्र सुन्दर पंख वाले गरुड़ विशाल सेना का नाश होते देखकर भी उस विशाल जनसमूह की प्रशंसा नहीं करते।
 
Bhaarata! The beautiful winged Garuda, son of Vinata, does not praise the large crowd even when he sees the destruction of a huge army. 84.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)