Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 6.3.51-52h: कुछ देर सोचने के बाद वे पुनः इस प्रकार बोले - 'राजेन्द्र! इसमें सन्देह नहीं कि काल ही इस जगत् का नाश करता है और काल ही इन समस्त लोकों की रचना भी करता है। यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है।' | mahabharat अध्याय 6.3: व्यासजीके द्वारा अमंगलसूचक उत्पातों तथा विजयसूचक लक्षणोंका वर्णन । mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
स मुहूर्तं तथा ध्यात्वा पुनरेवाब्रवीद् वच:।
असंशयं पार्थिवेन्द्र काल: संक्षिपते जगत्॥ ५१॥
सृजते च पुनर्लोकान् नेह विद्यति शाश्वतम्।
अनुवाद
कुछ देर सोचने के बाद वे पुनः इस प्रकार बोले - 'राजेन्द्र! इसमें सन्देह नहीं कि काल ही इस जगत् का नाश करता है और काल ही इन समस्त लोकों की रचना भी करता है। यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है।'
After thinking for a while, he again spoke thus - 'Rajendra! There is no doubt that it is time which destroys this world and it is time which again creates all these worlds. Nothing here is permanent. 51 1/2.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥