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mahabharat 6.26.17: जो सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त है, उसे अविनाशी समझो। उस अविनाशी आत्मा को नष्ट करने में कोई समर्थ नहीं है।   |   mahabharat अध्याय 6.26: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 2: गीता का सार   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  6.26.17 
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
जो सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त है, उसे अविनाशी समझो। उस अविनाशी आत्मा को नष्ट करने में कोई समर्थ नहीं है।
 
Consider that which pervades the entire body as indestructible. No one is capable of destroying that indestructible soul.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)