श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 26: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 2: गीता का सार  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  6.26.15 
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुषश्रेष्ठ (अर्जुन)! जो मनुष्य सुख-दुःख से विचलित नहीं होता तथा दोनों में समभाव रखता है, वह निश्चय ही मोक्ष का अधिकारी है।
 
O best of men (Arjuna)! The man who is not disturbed by happiness and sorrow and remains equanimous in both, is certainly worthy of salvation.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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