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mahabharat 6.2.8: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! व्यासजी ने देखा कि धृतराष्ट्र युद्ध का दृश्य देखना नहीं चाहते, अपितु उसका पूर्ण विवरण सुनना चाहते हैं। तब वरदान देने में समर्थ उन महामुनि ने संजय को वरदान देते हुए कहा -॥8॥   |   mahabharat अध्याय 6.2: वेदव्यासजीके द्वारा संजयको दिव्य दृष्टिका दान तथा भयसूचक उत्पातोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 2: वेदव्यासजीके द्वारा संजयको दिव्य दृष्टिका दान तथा भयसूचक उत्पातोंका वर्णन  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  6.2.8 
वैशम्पायन उवाच
एतस्मिन् नेच्छति द्रष्टुं संग्रामं श्रोतुमिच्छति।
वराणामीश्वरो व्यास: संजयाय वरं ददौ॥ ८॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! व्यासजी ने देखा कि धृतराष्ट्र युद्ध का दृश्य देखना नहीं चाहते, अपितु उसका पूर्ण विवरण सुनना चाहते हैं। तब वरदान देने में समर्थ उन महामुनि ने संजय को वरदान देते हुए कहा -॥8॥
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! Vyasa saw that Dhritarashtra did not want to see the scene of the war but wanted to hear its full details. Then that great sage who was capable of giving boons, while giving a boon to Sanjaya said -॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)