श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 2: वेदव्यासजीके द्वारा संजयको दिव्य दृष्टिका दान तथा भयसूचक उत्पातोंका वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  6.2.5 
तेषु कालपरीतेषु विनश्यत्स्वेव भारत।
कालपर्यायमाज्ञाय मा स्म शोके मन: कृथा:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
हे भारत! जब वे काल के प्रभाव से नष्ट होने लगें, तब तू उसे काल का कर्म समझकर मन में शोक मत कर॥5॥
 
O Bharata! When they start getting destroyed under the influence of time, then do not think it to be the actions of time and grieve in your heart. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)