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mahabharat 6.122.25-27h: जिस प्रकार वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण पाण्डुपुत्र अर्जुन की सहायता करने के लिए दृढ़संकल्पित हैं, उसी प्रकार मैंने दुर्योधन के लिए धन, शरीर, स्त्री, पुत्र और यश सब कुछ त्याग दिया है। यज्ञों में प्रचुर दक्षिणा देने वाले कुरुनन्दन भीष्म! मैंने दुर्योधन का आश्रय लेकर सदैव पाण्डवों का क्रोध बढ़ाया है, ताकि यह क्षत्रिय जाति रोगों से न मर जाए (युद्ध में वीर गति को प्राप्त हो)।   |   mahabharat अध्याय 6.122: भीष्म और कर्णका रहस्यमय संवाद   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  6.122.25-27h 
वसुदेवसुतो यद्वत् पाण्डवाय दृढव्रत:।
वसु चैव शरीरं च पुत्रदारं तथा यश:॥ २५॥
सर्वं दुर्योधनस्यार्थे त्यक्तं मे भूरिदक्षिण।
मा चैतद् व्याधिमरणं क्षत्रं स्यादिति कौरव॥ २६॥
कोपिता: पाण्डवा नित्यं समाश्रित्य सुयोधनम्।
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण पाण्डुपुत्र अर्जुन की सहायता करने के लिए दृढ़संकल्पित हैं, उसी प्रकार मैंने दुर्योधन के लिए धन, शरीर, स्त्री, पुत्र और यश सब कुछ त्याग दिया है। यज्ञों में प्रचुर दक्षिणा देने वाले कुरुनन्दन भीष्म! मैंने दुर्योधन का आश्रय लेकर सदैव पाण्डवों का क्रोध बढ़ाया है, ताकि यह क्षत्रिय जाति रोगों से न मर जाए (युद्ध में वीर गति को प्राप्त हो)।
 
Just as Vasudevanandan Shri Krishna is determined to help Pandu's son Arjuna, similarly my wealth, body, wife, son and fame have sacrificed everything for Duryodhana. Kurunandan Bhishma, who gives abundant dakshina in yagyas! I have always increased the anger of the Pandavas by taking the shelter of Duryodhana so that this Kshatriya caste does not die due to diseases (achieve heroic progress in the war).
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)