श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 111: कौरव-पाण्डवपक्षके प्रमुख महारथियोंके द्वन्द्व-युद्धका वर्णन  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  6.111.57 
दु:शासनोऽपि परया शक्त्या पार्थमवारयत्।
कथं भीष्मं न नो हन्यादिति निश्चित्य भारत॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
भारत! उस समय दु:शासन भी अर्जुन को रोकने के लिए अपनी पूरी शक्ति से प्रयत्न कर रहा था; क्योंकि वह किसी भी प्रकार हमारे भीष्म को मारने में समर्थ न हो, ऐसा निश्चय कर रहा था॥57॥
 
Bhaarat! At that time Dushasan also tried with all his might to stop Arjuna, being determined that he should not be able to kill our Bhishma in any way. ॥ 57॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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