प्रजानाथ! तत्पश्चात् जब होश आया, तब आपके महाबली एवं पराक्रमी पुत्र दुःशासन ने कुन्तीकुमार अर्जुन को अत्यन्त तीक्ष्ण बाणों द्वारा पुनः रोक दिया, मानो इन्द्र ने वृत्रासुर की गति रोक दी हो। दैत्यराज दुःशासन ने अपने बाणों से अर्जुन को क्षत-विक्षत कर दिया; परन्तु वह तनिक भी व्यथित नहीं हुआ॥47-48॥
Prajanath! Thereafter, when he regained consciousness, your mighty and valiant son Dushasana again stopped Kuntikumar Arjun with very sharp arrows, as if Indra had stopped the movement of Vritrasura. The giant Dushasana mutilated Arjuna with his arrows; But he was not distressed at all. 47-48॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि अर्जुनदु:शासनसमागमे दशाधिकशततमोऽध्याय:॥ ११०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें अर्जुन और दु:शासनका युद्धविषयक
एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११०॥ [दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ४९ १/२ श्लोक हैं।]
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥