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श्लोक 6.11.1  |
धृतराष्ट्र उवाच
जम्बूखण्डस्त्वया प्रोक्तो यथावदिह संजय।
विष्कम्भमस्य प्रब्रूहि परिमाणं तु तत्त्वत:॥ १॥ |
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| अनुवाद |
| धृतराष्ट्र बोले - संजय! तुमने यहाँ जम्बूखण्ड का यथार्थ वर्णन किया है। अब मुझे उसका विस्तार और आकार ठीक-ठीक बताओ।॥1॥ |
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| Dhritarashtra said - Sanjay! You have described Jambukhand here in its true form. Now tell me its extent and size accurately.॥ 1॥ |
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