श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 107: नवें दिनके युद्धकी समाप्ति, रातमें पाण्डवोंकी गुप्त मन्त्रणा तथा श्रीकृष्णसहित पाण्डवोंका भीष्मसे मिलकर उनके वधका उपाय जानना  »  श्लोक 93-94
 
 
श्लोक  6.107.93-94 
यस्याहमधिरुह्याङ्कं बाल: किल गदाग्रज।
तातेत्यवोचं पितरं पितु: पाण्डोर्महात्मन:॥ ९३॥
नाहं तातस्तव पितुस्तातोऽस्मि तव भारत।
इति मामब्रवीद् बाल्ये य: स वध्य: कथं मया॥ ९४॥
 
 
अनुवाद
गदगराज! कहते हैं कि जब मैं बचपन में अपने पिता पाण्डु के पितातुल्य भीष्मजी की गोद में बैठा करता था और उन्हें 'पिता' कहता था, उसी समय वे मुझसे कहा करते थे - 'भरतनन्दन! मैं तुम्हारा पिता नहीं हूँ, मैं तुम्हारे पिता का पिता हूँ।' वही वृद्ध पितामह मेरे हाथों मारे जाने के योग्य कैसे हो सकते हैं?॥ 93-94॥
 
Gadagraj! It is said that when in my childhood I used to sit on the lap of Bhishmaji, who was like a father to my father Pandu, and used to call him 'father', at that time itself in that childhood he used to say to me - 'Bharatanandan! I am not your father, I am your father's father.' How can that same old grandfather be worthy of being killed by me?॥ 93-94॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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