श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 107: नवें दिनके युद्धकी समाप्ति, रातमें पाण्डवोंकी गुप्त मन्त्रणा तथा श्रीकृष्णसहित पाण्डवोंका भीष्मसे मिलकर उनके वधका उपाय जानना  »  श्लोक 86-87
 
 
श्लोक  6.107.86-87 
एष तस्मात् पुरोधाय कञ्चिदन्यं ममाग्रत:॥ ८६॥
आत्तशस्त्रो रणे यत्तो गृहीतवरकार्मुक:।
मां पातयतु बीभत्सुरेवं तव जयो ध्रुवम्॥ ८७॥
 
 
अनुवाद
अतः अर्जुन को चाहिए कि वह उत्तम धनुष आदि अस्त्र लेकर युद्ध के लिए सावधानी से प्रयत्न करे और उपर्युक्त गुणों से युक्त पुरुष अथवा शिखण्डी को मेरे सामने खड़ा करके उसके बाणों से मुझे मार डाले। इस प्रकार तुम निश्चय ही विजयी होगे। 86-87।
 
Therefore Arjuna should take up the best bow and other weapons and should cautiously strive for battle and should place a person endowed with the above-mentioned qualities or Shikhandi in front of me and kill me with his arrows. In this way you can certainly be victorious. 86-87.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)