|
| |
| |
श्लोक 6.107.61-62h  |
तथा ब्रुवाणं गाङ्गेयं प्रीतियुक्तं पुन: पुन:॥ ६१॥
उवाच राजा दीनात्मा प्रीतियुक्तमिदं वच:। |
| |
| |
| अनुवाद |
| जब गंगापुत्र भीष्म प्रसन्नतापूर्वक बार-बार ऐसा कह रहे थे, उस समय राजा युधिष्ठिर ने विनीत मन से प्रेमपूर्वक ये वचन कहे-॥61 1/2॥ |
| |
| When Ganga's son Bhishma was saying this happily again and again, at that time King Yudhishthira with a humble heart said these words lovingly -॥ 61 1/2॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|