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श्लोक 5.97.21  |
इत्यामन्त्र्य सुधर्मां स कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम्।
कन्यां शिरस्युपाघ्राय प्रविवेश महीतलम्॥ २१॥ |
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| अनुवाद |
| सुधर्मा से यह सलाह लेकर मातलि ने अपने इष्ट देवता की परिक्रमा की और कन्या का सिर सूंघकर रसातल में प्रवेश किया। |
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| After taking this advice from Sudharmā, Mātali circumambulated his favourite deity and after smelling the girl's head entered the abyss. |
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इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि मातलिवरान्वेषणे सप्तनवतितमोऽध्याय:॥ ९७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें मातलिके वर खोजनेसे सम्बन्ध रखनेवाला सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९७॥
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