श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 97: कण्व मुनिका दुर्योधनको संधिके लिये समझाते हुए मातलिका उपाख्यान आरम्भ करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  5.97.17 
देवमानुषलोकौ द्वौ मानुषेणैव चक्षुषा।
अवगाह्यैव विचितौ न च मे रोचते वर:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
मैंने मानवीय दृष्टिकोण से उस कन्या के लिए स्वर्गलोक और मनुष्यलोक दोनों में भली-भाँति वर की खोज की है, परंतु मुझे वहाँ कोई भी वर पसंद नहीं आया।॥17॥
 
According to the human perspective I have thoroughly searched for a groom for the girl in both the heavenly realm and the human realm, but I do not like any groom there.'॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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