श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 93: श्रीकृष्णका कौरव-पाण्डवोंमें संधिस्थापनके प्रयत्नका औचित्य बताना  »  श्लोक d1
 
 
श्लोक  5.93.d1 
(वैशम्पायन उवाच
विदुरस्य वच: श्रुत्वा प्रश्रितं पुरुषोत्तम:।
इदं होवाच वचनं भगवान‍् मधुसूदन:॥ )
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! विदुरजी के ये प्रेमपूर्ण और विनम्र वचन सुनकर भगवान मधुसूदन ने ऐसा कहा।
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! On hearing these loving and humble words of Vidur, the Supreme Lord Madhusudana said this.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)