vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 5: उद्योग पर्व
»
अध्याय 93: श्रीकृष्णका कौरव-पाण्डवोंमें संधिस्थापनके प्रयत्नका औचित्य बताना
»
श्लोक d1
श्लोक
5.93.d1
(वैशम्पायन उवाच
विदुरस्य वच: श्रुत्वा प्रश्रितं पुरुषोत्तम:।
इदं होवाच वचनं भगवान् मधुसूदन:॥ )
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! विदुरजी के ये प्रेमपूर्ण और विनम्र वचन सुनकर भगवान मधुसूदन ने ऐसा कहा।
Vaishmpayana says - Janamejaya! On hearing these loving and humble words of Vidur, the Supreme Lord Madhusudana said this.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×