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श्लोक 5.93.6  |
धर्मकार्यं यतञ्छक्त्या नो चेत् प्राप्नोति मानव:।
प्राप्तो भवति तत् पुण्यमत्र मे नास्ति संशय:॥ ६॥ |
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| अनुवाद |
| यदि कोई मनुष्य पूरी शक्ति से भी कोई धार्मिक कार्य करने का प्रयत्न करे और उसमें सफल न हो, तो भी उसे उसका फल अवश्य प्राप्त होगा। इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है ॥6॥ |
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| Even if a man tries to perform a religious deed with all his might and does not succeed in it, he will certainly obtain the merits of it. I have no doubt about this. ॥ 6॥ |
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