श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 93: श्रीकृष्णका कौरव-पाण्डवोंमें संधिस्थापनके प्रयत्नका औचित्य बताना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  5.93.22 
वैशम्पायन उवाच
इत्येवमुक्त्वा वचनं वृष्णीनामृषभस्तदा।
शयने सुखसंस्पर्शे शिश्ये यदुसुखावह:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन! यदुवंश को सुख देने वाले वृष्णिवंश विभूषण श्रीकृष्ण विदुरजी से उपरोक्त बात कहकर स्पर्श मात्र से सुख देने वाले शय्या पर सो गए॥22॥
 
Vaishampayanji says- Rajan! Vrishnivansh Vibhushan, who gives happiness to the Yadu clan, after saying the above to Shri Krishna Vidurji, slept on the bed which gives happiness just by touching it. 22॥
 
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि श्रीकृष्णवाक्ये त्रिनवतितमोऽध्याय:॥ ९३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें श्रीकृष्णवाक्यविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९३॥

[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २३ श्लोक हैं।]
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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