श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 93: श्रीकृष्णका कौरव-पाण्डवोंमें संधिस्थापनके प्रयत्नका औचित्य बताना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  5.93.19 
अहापयन् पाण्डवार्थं यथाव-
च्छमं कुरूणां यदि चाचरेयम्।
पुण्यं च मे स्याच्चरितं महात्मन्
मुच्येरंश्च कुरवो मृत्युपाशात्॥ १९॥
 
 
अनुवाद
महात्मन! यदि मैं पाण्डवों और कौरवों के स्वार्थ में किसी प्रकार की बाधा न आने देकर उनके बीच उचित संधि करा सकूँ, तो यह मेरा महान पुण्य कर्म हो जाएगा और कौरव भी मृत्यु के पाश से छूट जाएँगे॥19॥
 
Mahatman! If I can make a suitable treaty between the Pandavas and the Kauravas by not allowing any hindrance in their selfishness, then this will become a great virtuous deed by me and the Kauravas will also be freed from the trap of death. 19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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