श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 93: श्रीकृष्णका कौरव-पाण्डवोंमें संधिस्थापनके प्रयत्नका औचित्य बताना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  5.93.17 
उभयो: साधयन्नर्थमहमागत इत्युत।
तत्र यत्नमहं कृत्वा गच्छेयं नृष्ववाच्यताम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
मैं यहाँ केवल दोनों पक्षों का हित साधने के लिए आया हूँ। इसके लिए पूर्ण प्रयत्न करने के बाद मैं लोगों के बीच निन्दा का पात्र नहीं बनूँगा। ॥17॥
 
I have come here only to fulfill the interests of both the parties. After making full efforts for this, I will not become an object of criticism among the people. ॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)