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श्लोक 5.93.14  |
हिते प्रयतमानं मां शङ्केद् दुर्योधनो यदि।
हृदयस्य च मे प्रीतिरानृण्यं च भविष्यति॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| दूसरों के कल्याण के लिए ऐसा प्रयत्न करने पर भी यदि दुर्योधन मुझ पर संदेह करे, तो भी मेरा मन प्रसन्न रहेगा और मैं अपने कर्तव्य के भार से मुक्त हो जाऊँगा ॥14॥ |
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| Even if Duryodhan doubts me after making such efforts to achieve the welfare of others, my mind will still be happy and I will be relieved of the burden of my duty. ॥ 14॥ |
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