श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 92: विदुरजीका धृतराष्ट्रपुत्रोंकी दुर्भावना बताकर श्रीकृष्णको उनके कौरवसभामें जानेका अनौचित्य बतलाना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  5.92.4 
कामात्मा प्राज्ञमानी च मित्रध्रुक् सर्वशङ्कित:।
अकर्ता चाकृतज्ञश्च त्यक्तधर्मा प्रियानृत:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
उसका मन भोगों में आसक्त है, वह अपने को विद्वान समझता है, मित्रों से विश्वासघात करता है और सब को संदेह की दृष्टि से देखता है। वह स्वयं किसी की सहायता नहीं करता, तथा दूसरों के उपकारों को भी स्वीकार नहीं करता। वह धर्म को त्यागकर असत्य से प्रेम करने लगा है।॥4॥
 
‘His mind is addicted to pleasures, he thinks he is learned, betrays his friends and looks at everyone with suspicion. He does not help anyone himself, and does not even acknowledge the favors done by others. He has abandoned Dharma and started loving untruth.॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)