श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 92: विदुरजीका धृतराष्ट्रपुत्रोंकी दुर्भावना बताकर श्रीकृष्णको उनके कौरवसभामें जानेका अनौचित्य बतलाना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  5.92.23 
आशंसते वै धृतराष्ट्रस्य पुत्रो
महाराज्यमसपत्नं पृथिव्याम्।
तस्मिञ्छम: केवलो नोपलभ्यो
बद्धं सन्तं मन्यते लब्धमर्थम्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र का वह ज्येष्ठ पुत्र समस्त लोकों पर शत्रुरहित राज्य पाने की आशा रखता है। वह मन में यह भी निश्चय करता है कि जुए से प्राप्त धन और राज्य अब उसके अधीन ही रहना चाहिए; अतः उसके साथ संधि का कोई भी प्रयत्न सफल नहीं होगा॥ 23॥
 
‘That eldest son of Dhritarashtra hopes to get an enemy-free empire on the whole world. He also resolves in his mind that the wealth and kingdom obtained through gambling should now remain under his control; hence, any attempt at a treaty with him will not be successful.॥ 23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)