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mahabharat 5.92.2: जनार्दन! मन्दबुद्धि दुर्योधन ने धर्म और अर्थ दोनों का उल्लंघन किया है। वह क्रोधी है, दूसरों का मान नष्ट करता है और अपने लिए मान चाहता है। उसने बड़ों और गुरुजनों की आज्ञा भी अस्वीकार कर दी है॥ 2॥   |   mahabharat अध्याय 5.92: विदुरजीका धृतराष्ट्रपुत्रोंकी दुर्भावना बताकर श्रीकृष्णको उनके कौरवसभामें जानेका अनौचित्य बतलाना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 92: विदुरजीका धृतराष्ट्रपुत्रोंकी दुर्भावना बताकर श्रीकृष्णको उनके कौरवसभामें जानेका अनौचित्य बतलाना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  5.92.2 
अर्थधर्मातिगो मन्द: संरम्भी च जनार्दन।
मानघ्नो मानकामश्च वृद्धानां शासनातिग:॥ २॥
 
 
अनुवाद
जनार्दन! मन्दबुद्धि दुर्योधन ने धर्म और अर्थ दोनों का उल्लंघन किया है। वह क्रोधी है, दूसरों का मान नष्ट करता है और अपने लिए मान चाहता है। उसने बड़ों और गुरुजनों की आज्ञा भी अस्वीकार कर दी है॥ 2॥
 
‘Janardan! The slow-witted Duryodhan has violated both Dharma and Artha. He is short-tempered, destroys the honour of others and seeks honour for himself. He has even rejected the orders of the elders and teachers.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)