Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 5.90.10-15h: जब वे अपनी राजधानी के ऊँचे बुर्जों में मृगचर्म से बने कोमल बिस्तरों पर सोते थे, तब हाथियों की चिंघाड़, घोड़ों की हिनहिनाहट और रथ के पहियों की घरघराहट से उनकी नींद टूट जाती थी। शंख और तुरही की तीव्र ध्वनि तथा वेणु और वीणा की मधुर ध्वनि से उनकी नींद खुल जाती थी। साथ ही, ब्राह्मण भी पुण्याहवाचन की पवित्र ध्वनि से उनका सम्मान करते थे। श्रेष्ठ ब्राह्मणों के शुभ आशीर्वाद सुनकर वे जाग जाते थे। पूजनीय और पूजनीय पुरुष भी उनकी स्तुति गाकर उनका अभिवादन करते थे और उठने पर वे ब्राह्मणों का रत्न, वस्त्र और आभूषणों से पूजन करते थे। हे जनार्दन! वही पाण्डव उस विशाल वन में जंगली पशुओं के क्रूर वचन सुनकर अच्छी तरह सो नहीं पाते होंगे, यद्यपि वे ऐसी दयनीय स्थिति के कभी योग्य नहीं थे। | mahabharat अध्याय 5.90: श्रीकृष्णका कुन्तीके समीप जाना एवं युधिष्ठिरका कुशल-समाचार पूछकर अपने दु:खोंका स्मरण करके विलाप करती हुई कुन्तीको आश्वासन देना । mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
ये स्म वारणशब्देन हयानां ह्रेषितेन च॥ १०॥
रथनेमिनिनादैश्च व्यबोध्यन्त तदा गृहे।
शङ्खभेरीनिनादेन वेणुवीणानुनादिना॥ ११॥
पुण्याहघोषमिश्रेण पूज्यमाना द्विजातिभि:।
वस्त्रै रत्नैरलंकारै: पूजयन्तो द्विजन्मन:॥ १२॥
गीर्भिर्मङ्गलयुक्ताभिर्ब्राह्मणानां महात्मनाम्।
अर्चितैरर्चनार्हैश्च स्तुवद्भिरभिनन्दिता:॥ १३॥
प्रासादाग्रेष्वबोध्यन्त राङ्कवाजिनशायिन:।
क्रूरं च निनदं श्रुत्वा श्वापदानां महावने॥ १४॥
न स्मोपयान्ति निद्रां ते न तदर्हा जनार्दन।
अनुवाद
जब वे अपनी राजधानी के ऊँचे बुर्जों में मृगचर्म से बने कोमल बिस्तरों पर सोते थे, तब हाथियों की चिंघाड़, घोड़ों की हिनहिनाहट और रथ के पहियों की घरघराहट से उनकी नींद टूट जाती थी। शंख और तुरही की तीव्र ध्वनि तथा वेणु और वीणा की मधुर ध्वनि से उनकी नींद खुल जाती थी। साथ ही, ब्राह्मण भी पुण्याहवाचन की पवित्र ध्वनि से उनका सम्मान करते थे। श्रेष्ठ ब्राह्मणों के शुभ आशीर्वाद सुनकर वे जाग जाते थे। पूजनीय और पूजनीय पुरुष भी उनकी स्तुति गाकर उनका अभिवादन करते थे और उठने पर वे ब्राह्मणों का रत्न, वस्त्र और आभूषणों से पूजन करते थे। हे जनार्दन! वही पाण्डव उस विशाल वन में जंगली पशुओं के क्रूर वचन सुनकर अच्छी तरह सो नहीं पाते होंगे, यद्यपि वे ऐसी दयनीय स्थिति के कभी योग्य नहीं थे।
‘When they used to sleep on soft beds made of deer skin in the high towers of their capital, their sleep used to be broken by the trumpeting of elephants, the neighing of horses and the whirring of chariot wheels. They used to be awakened by the loud sound of conch and trumpets and the sweet sounds of Venu and Veena. Also, the Brahmins used to honour them with the holy sound of Punyaahavachan. They used to wake up on hearing the auspicious blessings of the great Brahmins. The revered and worshipful men also used to greet them by singing their praises and on getting up, they used to worship the Brahmins with gems, clothes and ornaments. Janardan! Those same Pandavas must not have been able to sleep well on hearing the cruel words of the wild animals in that vast forest, although they were never worthy of such a miserable condition.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥