श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 83: श्रीकृष्णका हस्तिनापुरको प्रस्थान, युधिष्ठिरका माता कुन्ती एवं कौरवोंके लिये संदेश तथा श्रीकृष्णको मार्गमें दिव्य महर्षियोंका दर्शन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  5.83.14 
ततस्तन्मतमाज्ञाय केशवस्य पुर:सरा:।
प्रसस्रुर्योजयिष्यन्तो रथं चक्रगदाभृत:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
तब चक्र और गदा धारण किये हुए भगवान श्रीकृष्ण का आशय समझकर, उनके आगे चल रहे सेवक रथ को जोतने के लिए दौड़े।
 
Then, realizing the intention of Lord Krishna, who was holding the discus and the mace, his servants walking ahead of him ran to harness the chariot.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)