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श्लोक 5.79.21  |
सर्वथा तु मया कार्यं धर्मराजस्य शासनम्।
विभाव्यं तस्य भूयश्च कर्म पापं दुरात्मन:॥ २१॥ |
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| अनुवाद |
| मुझे वहाँ जाकर सबसे पहले धर्मराज की आज्ञा के अनुसार शांति स्थापित करने का हर संभव प्रयास करना होगा। यदि इसमें सफलता न मिले तो मुझे सोचना होगा कि दुष्ट दुर्योधन को उसके पाप कर्मों का दण्ड कैसे दूँ। |
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| I have to go there and first of all make every effort to make peace as per the orders of Dharmaraj. If this does not succeed then I will have to think about how to punish the evil-minded Duryodhan for his sinful deeds. |
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इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि श्रीकृष्णवाक्ये एकोनाशीतितमोऽध्याय:॥ ७९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें श्रीकृष्णवाक्यविषयक उन्नासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७९॥
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