श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 77: श्रीकृष्णका भीमसेनको आश्वासन देना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.77.3 
यथा चात्मनि कल्याणं सम्भावयसि पाण्डव।
सहस्रगुणमप्येतत् त्वयि सम्भावयाम्यहम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
पाण्डुनन्दन! जैसे आप अपने अन्दर सद्गुणों का दर्शन करते हैं, वैसे ही मैं आपमें उनसे हजारों गुना अधिक सद्गुणों का दर्शन करता हूँ॥3॥
 
Pandunandan! Just as you envision good qualities in yourself, I envision thousands of times more virtues in you. 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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