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mahabharat 5.73.4: उसके लिए विधाता ने यह शाश्वत कर्तव्य निर्धारित किया है कि या तो वह युद्ध में विजय प्राप्त करे या वहीं प्राण त्याग दे। यही क्षत्रिय का स्वधर्म है। दुर्बलता या कायरता उसके लिए प्रशंसा की वस्तु नहीं है। ॥4॥   |   mahabharat अध्याय 5.73: श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको युद्धके लिये प्रोत्साहन देना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 73: श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको युद्धके लिये प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  5.73.4 
जयो वधो वा संग्रामे धात्राऽऽदिष्ट: सनातन:।
स्वधर्म: क्षत्रियस्यैष कार्पण्यं न प्रशस्यते॥ ४॥
 
 
अनुवाद
उसके लिए विधाता ने यह शाश्वत कर्तव्य निर्धारित किया है कि या तो वह युद्ध में विजय प्राप्त करे या वहीं प्राण त्याग दे। यही क्षत्रिय का स्वधर्म है। दुर्बलता या कायरता उसके लिए प्रशंसा की वस्तु नहीं है। ॥4॥
 
For him, the creator has given this eternal duty that he should either win the battle or give up his life there. This is the svadharma of a Kshatriya. Weakness or cowardice is not an object of praise for him. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)