श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  5.72.12 
सुयोधनमते तिष्ठन् राजास्मासु जनार्दन।
मिथ्या चरति लुब्ध: सन् चरन् हि प्रियमात्मन:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
हे जनार्दन! इसका लोभ इतना बढ़ गया है कि यह दुर्योधन की हर बात मान लेता है और अपना ही प्रिय कार्य कर रहा है और हमारे साथ बेईमानी कर रहा है॥12॥
 
O Janardan! His greed has increased so much that he agrees with everything Duryodhan says and is doing his own favourite work and is behaving dishonestly with us.॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)