श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 71: धृतराष्ट्रके द्वारा भगवद्‍गुणगान  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  5.71.2 
ईरयन्तं भारतीं भारताना-
मभ्यर्चनीयां शङ्करीं सृंजयानाम्।
बुभूषद्भिर्ग्रहणीयामनिन्द्यां
परासूनामग्रहणीयरूपाम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
भगवान् अत्यन्त मनोहर वाणी में जो प्रवचन करेंगे, वह भरतवंशियों और सृंजयवासियों के लिए कल्याणकारी और आदरणीय होगा। जो मनुष्य कल्याण की कामना रखते हैं, उनके लिए भगवान् की वाणी अनापत्तिप्रद और ग्रहणयोग्य होगी; किन्तु जो मरणासन्न हैं, उनके लिए वह अस्वीकार्य प्रतीत होगी॥2॥
 
The discourse which the Lord will deliver in a very charming voice will be beneficial and honourable to the descendants of Bharata and the people of Srinjaya. For men who desire prosperity, the Lord's speech will be unobjectionable and acceptable; but for those who are near death, it will seem unacceptable.॥2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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