श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 70: भगवान‍् श्रीकृष्णके विभिन्न नामोंकी व्युत्पत्तियोंका कथन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  5.70.6 
पुण्डरीकं परं धाम नित्यमक्षयमव्ययम्।
तद्भावात् पुण्डरीकाक्षो दस्युत्रासाज्जनार्दन:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
अनादि, अक्षय, अविनाशी और परमपिता परमेश्वर के धाम का नाम पुण्डरीक है। जो भगवान इसमें अक्षुण्ण निवास करते हैं, उन्हें 'पुण्डरीकाक्ष' (या पुण्डरीक - उनके नेत्र कमल के समान हैं, इसलिए उनका नाम पुण्डरीकाक्ष है) कहते हैं। डाकुओं को कष्ट देने के कारण उन्हें 'जनार्दन' कहा जाता है।
 
The name of eternal, inexhaustible, imperishable and supreme God's place is Pundarika. The Lord who resides in it intact, is called 'Pundrikaksh' (or Pundarik - His eyes are like lotus, hence his name is Pundrikaksh). He is called 'Janardan' because of the trouble he gives to the bandits.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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