पूरणात् सदनाच्चापि ततोऽसौ पुरुषोत्तम:।
असतश्च सतश्चैव सर्वस्य प्रभवाप्ययात्॥ ११॥
सर्वस्य च सदा ज्ञानात् सर्वमेतं प्रचक्षते।
अनुवाद
वे सर्वत्र विद्यमान हैं और सबमें निवास करते हैं, इसलिए वे 'पुरुष' हैं और सब मनुष्यों में श्रेष्ठ होने के कारण 'पुरुषोत्तम' कहलाते हैं। वे सत् और असत्, सबकी उत्पत्ति और प्रलय के स्थान हैं और उन सबका सदैव ज्ञान रखते हैं, इसलिए वे 'सर्व' कहलाते हैं।
He is present everywhere and is the abode of all, therefore he is the 'Purusha' and being the best among all men, he is called 'Purushottam'. He is the place of origin and dissolution of all, the real and the unreal, and always has knowledge of all of them; therefore he is called 'Sarva'. 11 1/2.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥