श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 70: भगवान‍् श्रीकृष्णके विभिन्न नामोंकी व्युत्पत्तियोंका कथन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  5.70.1 
धृतराष्ट्र उवाच
भूयो मे पुण्डरीकाक्षं संजयाचक्ष्व पृच्छत:।
नामकर्मार्थवित् तात प्राप्नुयां पुरुषोत्तमम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र बोले - संजय! तुम भगवान श्रीकृष्ण के नाम और कर्म का अर्थ जानते हो, अतः मेरे प्रश्नानुसार एक बार पुनः कमलनयन भगवान श्रीकृष्ण का वर्णन करो॥1॥
 
Dhritarashtra said – Sanjay! You know the meaning of the name and deeds of Lord Shri Krishna, hence as per my question, once again describe the lotus-eyed Lord Shri Krishna. 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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