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mahabharat 5.62.17: जब अजेय भगवान परशुरामजी के पास ब्राह्मण बनकर कर्ण ने ब्रह्मास्त्र की शिक्षा ली, उसी समय उस नारदपुत्र सूतपुत्र का धर्म और तप नष्ट हो गया॥17॥   |   mahabharat अध्याय 5.62: कर्णकी आत्मप्रशंसा, भीष्मके द्वारा उसपर आक्षेप, कर्णका सभा त्यागकर जाना और भीष्मका उसके प्रति पुन: आक्षेपयुक्त वचन कहना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 62: कर्णकी आत्मप्रशंसा, भीष्मके द्वारा उसपर आक्षेप, कर्णका सभा त्यागकर जाना और भीष्मका उसके प्रति पुन: आक्षेपयुक्त वचन कहना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  5.62.17 
यदैव रामे भगवत्यनिन्द्ये
ब्रह्म ब्रुवाण: कृतवांस्तदस्त्रम्।
तदैव धर्मश्च तपश्च नष्टं
वैकर्तनस्याधमपूरुषस्य॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जब अजेय भगवान परशुरामजी के पास ब्राह्मण बनकर कर्ण ने ब्रह्मास्त्र की शिक्षा ली, उसी समय उस नारदपुत्र सूतपुत्र का धर्म और तप नष्ट हो गया॥17॥
 
When Karna, pretending to be a Brahmin near the invincible Lord Parshuram, took the teachings of Brahmastra, at that very moment the religion and penance of that son of Naradaham Suta were destroyed'. 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)