श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 61: दुर्योधनद्वारा आत्मप्रशंसा  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  5.61.7 
तस्मान्न भवता चिन्ता कार्यैषा स्यात् कथंचन।
दैवेष्वपेक्षका ह्येते शश्वद् भावेषु भारत॥ ७॥
 
 
अनुवाद
‘अतः हे भरतनन्दन! तुम्हें किसी भी प्रकार से ऐसी बातों की चिन्ता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि देवता सदैव शांति आदि दिव्य भावों की अपेक्षा करते हैं, काम, क्रोध आदि आसुरी भावों की नहीं॥ 7॥
 
‘Therefore, Bharatanandan! You should not worry about such things in any way, because the gods always expect divine feelings like calmness etc. and not demonic feelings like lust, anger etc.॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)