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mahabharat 5.61.2: हे महाराज! आपका यह मानना ​​उचित नहीं है कि कुंतीपुत्रों को पराजित करना असंभव है, क्योंकि देवता उनके समर्थक हैं। यह भय आपके मन से दूर हो जाना चाहिए॥ 2॥   |   mahabharat अध्याय 5.61: दुर्योधनद्वारा आत्मप्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 61: दुर्योधनद्वारा आत्मप्रशंसा  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  5.61.2 
अशक्या देवसचिवा: पार्था: स्युरिति यद् भवान्।
मन्यते तद् भयं व्येतु भवतो राजसत्तम॥ २॥
 
 
अनुवाद
हे महाराज! आपका यह मानना ​​उचित नहीं है कि कुंतीपुत्रों को पराजित करना असंभव है, क्योंकि देवता उनके समर्थक हैं। यह भय आपके मन से दूर हो जाना चाहिए॥ 2॥
 
‘O great king! It is not correct that you believe that it is impossible to defeat Kunti's sons because the gods are their supporters. This fear should go away from your mind.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)