श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 59: संजयका धृतराष्ट्रके पूछनेपर उन्हें श्रीकृष्ण और अर्जुनके अन्त:पुरमें कहे हुए संदेश सुनाना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  5.59.22 
ऋणमेतत् प्रवृद्धं मे हृदयान्नापसर्पति।
यद् गोविन्देति चुक्रोश कृष्णा मां दूरवासिनम्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
'जब कौरव सभा में द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था, तब मैं हस्तिनापुर से बहुत दूर था। उस समय कृष्ण ने व्यथित होकर मुझे 'गोविंद' कहा था। इसका मुझ पर बहुत बड़ा ऋण है और यह ऋण बढ़ता ही जा रहा है। इसका भार मेरे हृदय से (दोषी कौरवों का वध किए बिना) नहीं उतर सकता।'
 
‘When Draupadi's clothes were being pulled in the Kaurava Sabha, I was far away from Hastinapur. At that time Krishna had called me 'Govind' with a feeling of anguish. I have a huge debt for that and this debt is increasing. Its burden cannot be removed from my heart (without killing the guilty Kauravas).
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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