श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 58: धृतराष्ट्रका दुर्योधनको संधिके लिये समझाना, दुर्योधनका अहंकारपूर्वक पाण्डवोंसे युद्ध करनेका ही निश्चय तथा धृतराष्ट्रका अन्य योद्धाओंको युद्धसे भय दिखाना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  5.58.18 
यावद्धि सूच्यास्तीक्ष्णाया विध्येदग्रेण मारिष।
तावदप्यपरित्याज्यं भूमेर्न: पाण्डवान् प्रति॥ १८॥
 
 
अनुवाद
पूज्य पिताश्री! मैं पाण्डवों को इतनी भी भूमि नहीं दे सकता, जितनी सुई की नोक से भी छेदी जा सके॥18॥
 
Respected father! I cannot give to the Pandavas even that much land that can be pierced by the tip of a sharp needle.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)