श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 56: संजयद्वारा अर्जुनके ध्वज एवं अश्वोंका तथा युधिष्ठिर आदिके घोड़ोंका वर्णन  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  5.56.11 
यथाऽऽकाशे शक्रधनु: प्रकाशते
न चैकवर्णं न च वेद्मि किं नु तत्।
तथा ध्वजो विहितो भौमनेन
बह्वाकारं दृश्यते रूपमस्य॥ ११॥
 
 
अनुवाद
जैसे आकाश में रंग-बिरंगा इन्द्रधनुष दिखाई देता है और समझना कठिन हो जाता है कि वह क्या है? ठीक उसी प्रकार जैसे विश्वकर्मा द्वारा बनाया गया वह रंग-बिरंगा ध्वज। उसका रूप अनेक प्रकार का प्रतीत होता है।
 
Just like a multicoloured rainbow appears in the sky and it is difficult to understand what it is? Exactly like that colourful flag made by Vishwakarma. Its form appears to be of many types.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)